रूपक अलंकार: परिभाषा, उदाहरण, अर्थ, Roopak Alankar Definition

रूपक अलंकार किसे कहते है?

परिभाषा – जहाँ पर उपमेय और उपमान में कोई अंतर न दिखाई दे, वहाँ रूपक अलंकर होता है।

सरल शब्दों में – जब किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान को उसके समान न बताकर सीधा वही व्यक्ति / वस्तु बता दिया जाए तो वहाँ रूपक अलंकर होता है।

  • रूपक अलंकार का सम्राट महाकवि तुलसीदास जी को कहा जाता है 

उदाहरण –

चरण – कमल बंदौं हरि राई।

  • उपमेय = चरण
  • उपमान = कमल

इस वाक्य में चरण को कमल के समान नही बल्कि सीधा कमल ही कहा गया है, इसीलिए यह रूपक अलंकार है।

रूपक अलंकार के अन्य उदाहरण – 

  • मुख-चंद्र देखकर मन प्रसन्न हो गया।
  • जीवन एक संग्राम है।
  • उसके नयन कमल हैं।
  • माँ ममता की मूर्ति है।
  • उसके अधर गुलाब हैं।
  • उसकी वाणी अमृत है।
  • उदित उदयगिरि मंच पर रघुवर बाल पतंग।
  • अंबर पनघट में डुबो रही तारा-घट ऊषा नागरी।

रूपक अलंकार की प्रमुख विशेषता –

  • यह अर्थालंकार का भेद है
  • इसमें उपमेय और उपमान में अभेद स्थापित किया जाता है
  • इसमें उपमेय पर उपमान का आरोप होता है
  • इसमें सामान्यतः वाचक शब्दों ( समान, सा, सी, सम आदि ) का प्रयोग नही किया जाता है
  • इसमें उपमेय को उपमान का रूप दे दिया जाता है
  • रूपक अलंकार में कल्पना की प्रधानता होती है
  • इसमें उपमेय और उपमान का सम्बन्ध प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है
  • रूपक अलंकार की पंक्तियों में दो संज्ञाओं के बीच अधिकतर योजक चिन्ह ( – ) मिलता है

रूपक अलंकार के भेद –

काव्यशास्त्र के अनुसार रूपक अलंकार के मुख तीन भेद होते है-

  1. सांग रूपक अलंकार 
  2. निरंग रूपक अलंकार 
  3. परंपरित रूपक अलंकार 

1. सांग रूपक अलंकार-

परिभाषा – जहाँ उपमेय के अंगों पर उपमान के अंगों का आरोप करते हुए उपमेय और उपमान में पूर्ण अभेद स्थापित किया जाता है, वहाँ सांग रूपक अलंकार होता है।

  • अर्थात इसमें केवल मुख्य उपमान का आरोप नही होता, बल्कि उसके अंगो का आरोप किया जाता है।

उदाहरण –

उसका मुख चन्द्र है, नेत्र कमल है और केश मेघ है।

  • मुख – चन्द्र
  • नेत्र – कमल
  • केश – मेघ

इस वाक्य में व्यक्ति के विभिन्न अंगों पर अलग-अलग उपमानों का आरोप किया गया है। इसलिए यहाँ सांग रूपक अलंकार है।

अन्य उदाहरण – 

  • नयन कमल हैं, मुख चंद्र है, दाँत मोती हैं।
  • सके मुखरूपी चंद्रमा पर भौंहें धनुष की तरह सुशोभित हैं।
  • नयन दो कमल हैं, पुतलियाँ उनमें बैठे भँवरे हैं और पलकें उनकी पंखुड़ियाँ हैं।

2. निरंग रूपक अलंकार-

परिभाषा – जब केवल उपमेय पर उपमान का आरोप किया जाए और उपमान के अंगों का आरोप न किया जाए, तब निरंग रूपक अलंकार होता है।

निरंग का अर्थ = बिना अंगो के 

उदाहरण –

चरण – कमल की बंदना करता हूँ 

  • उपमेय = चरण
  • उपमान = कमल

यहाँ चरण को ही कमल मान लिया गया है लेकिन कमल के किसी अंग को चरण के किसी अंग पर आयोपित नही किया गया है, इसीलिए यह निरंग रूपक अलंकार है।

अन्य उदाहरण – 

  • उसका मुख चंद्र है।
  • बालक घर का दीपक है।
  • जीवन एक संग्राम है।
  • माता ममता की मूर्ति है।

3. परंपरित रूपक अलंकार-

परिभाषा – जब एक रूपक के आधार पर दूसरे रूपक की कल्पना की जाए, अर्थात् एक उपमान के कारण दूसरे उपमान का आरोप स्थापित हो, तब परंपरित रूपक अलंकार होता है।

उदाहरण –

मुख-चंद्र की चाँदनी से हृदय-सरोवर खिल उठा।

  • मुख – चन्द्र ( पहला रूपक )
  • ह्रदय – सरोवर ( दूसरा रूपक )

इस वाक्य में मुख-चंद्र की चाँदनी का प्रभाव हृदय-सरोवर पर पड़ रहा है, इसीलिए यह परंपरित रूपक अलंकार है।

अन्य उदाहरण – 

  • चरण-कमल की रज मनरूपी दर्पण को निर्मल करती है।
  • नेत्र-कमलों में प्रेम का मधु देखकर मन-भँवरा मँडराने लगा।
  • ज्ञान-सूर्य के प्रकाश से अज्ञान-अंधकार दूर हो गया।

रूपक अलंकार और उपमा अलंकार में अंतर-

रूपक और उपमा दोनों अर्थालंकार हैं, लेकिन दोनों में उपमेय और उपमान के संबंध को प्रस्तुत करने का तरीका अलग होता है। उपमा में समानता बताई जाती है, जबकि रूपक में उपमेय को उपमान ही मान लिया जाता है। नीचे चार्ट में इन दोनों के अंतर के बारे में बताया गया है –

आधार उपमा अलंकार रूपक अलंकार
1. अर्थ उपमेय की उपमान से समानता बताई जाती है। उपमेय पर उपमान का आरोप किया जाता है।
2. संबंध उपमेय और उपमान में सादृश्य/समानता होती है। उपमेय और उपमान में अभेद स्थापित किया जाता है।
3. वाचक शब्द इसमें प्रायः सा, सी, जैसे, समान, सदृश, तुल्य, सरिस आदि शब्द आते हैं। इसमें सामान्यतः उपमा के वाचक शब्द नहीं आते।
4. उपमेय की स्थिति उपमेय को उपमान के समान बताया जाता है। उपमेय को उपमान ही बता दिया जाता है।
5. कल्पना सामान्यतः तुलना पर आधारित होती है। आरोप और अभेद की कल्पना अधिक प्रभावशाली होती है।
6. उदाहरण उसका मुख चंद्रमा के समान सुंदर है। उसका मुख चंद्रमा है।
7. पहचान “किसके समान?” का भाव मिलता है। “यही वह है” अर्थात् अभेद का भाव मिलता है।

 

रूपक अलंकार FAQs-

प्रश्न- रूपक अलंकार किसे कहते है?

उत्तर- जहाँ पर उपमेय और उपमान में कोई अंतर न दिखाई दे उसे रूपक अलंकार कहते है

प्रश्न- रूपक अलंकार का सम्राट किसे कहा जाता है?

उत्तर- महाकवि तुलसीदास जी को

प्रश्न- मुख्य रूप से रूपक अलंकार के कितने भेद होते है?

उत्तर- मुख्य रूप से रूपक अलंकार के 3 भेद होते है

 

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