वीर रस किसे कहते है? परिभाषा, भेद और उदाहरण

वीर रस किसे कहते है?

परिभाषा – जिस काव्य या साहित्यिक रचना में युद्ध, पराक्रम, साहस, दान, दया अथवा धर्म की रक्षा आदि के माध्यम से उत्साह और वीरता की भावना उत्पन्न होती है, वहाँ वीर रस होता है।

सरल शब्दों में – युद्ध अथवा कठिन कार्य करने के लिए ह्रदय में जो उत्साह भाव जाग्रत होता है, उसे वीर रस कहते है।

वीर रस का स्थायी भाव  उत्साह होता है, अर्थात् जब मन में किसी कार्य को करने का उत्साह, साहस और दृढ़ संकल्प उत्पन्न होता है, तो वीर रस की अनुभूति होती है।

उदाहरण- 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

इस वाक्य में रानी लक्ष्मीबाई की वीरता, साहस और युद्ध-कौशल का वर्णन है, इसलिए यहाँ वीर रस है।

वीर रस की प्रमुख विशेषता –

वीर रस की कुछ मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार से है-

स्थायी भाव उत्साह = वीर रस का मूल स्थायी भाव उत्साह है।
साहस और वीरता = इसमें साहस, शौर्य और वीरता की भावना प्रमुख होती है।
पराक्रम का वर्णन = युद्ध, संघर्ष और कठिन परिस्थितियों में किए गए पराक्रम का चित्रण किया जाता है।
दृढ़ संकल्प = वीर व्यक्ति अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दृढ़ निश्चय रखता है।
शत्रु का सामना = शत्रु के सामने निडर होकर खड़े होने और उसे चुनौती देने का भाव दिखाई देता है।
देश और मातृभूमि के प्रति प्रेम = देश की रक्षा और मातृभूमि के लिए त्याग की भावना वीर रस को प्रभावशाली बनाती है।
धर्म और न्याय की रक्षा = सत्य, धर्म और न्याय की रक्षा के लिए संघर्ष का वर्णन भी वीर रस में मिलता है।
उत्साहवर्धक भाषा = वीर रस में ऐसी भाषा का प्रयोग होता है जो पाठक या श्रोता में जोश और उत्साह पैदा करती है।
ओजपूर्ण शैली = इसमें सामान्यतः ओज गुण और प्रभावशाली शब्दों का प्रयोग किया जाता है।
ललकार और चुनौती = शत्रु को ललकारना, युद्ध के लिए तैयार होना और विजय का संकल्प लेना इसकी प्रमुख अभिव्यक्तियाँ हैं।

वीर रस के भेद-

वीर रस के प्रमुख चार भेद माने जाते है

  1. युद्धवीर

  2. दानवीर

  3. दयावीर

  4. धर्मवीर 

इन सभी को विस्तार से समझते है –

1. युद्धवीर –

परिभाषा –  जब किसी व्यक्ति के युद्ध, शत्रु से संघर्ष, देश की रक्षा या युद्धभूमि में पराक्रम का वर्णन किया जाता है वहाँ युद्धवीर होता है।

उदाहरण- 

चढ़ चेतक पर तलवार उठा,
करता था भाला चमक उठा।

इस वाक्य में युद्ध और वीरता का वर्णन है, इसलिए युद्धवीर का भाव दिखाई देता है।

अन्य उदाहरण – 

  • खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी।
  • सिद्धि हेतु स्वामी गए, यह गौरव की बात,
    पर चोरी-चोरी गए, यही बड़ी है घात।
  • इंद्र जिमि जंभ पर, बाड़व सुअंभ पर,
    रावन सदंभ पर रघुकुल राज हैं।
  • दो न्याय अगर तो आधा दो,
    पर इसमें भी यदि बाधा हो।

2. दानवीर-

परिभाषा- जब किसी व्यक्ति के दान देने की उदारता, त्याग और परोपकार की भावना का वर्णन किया जाता है, वहाँ दानवीर होता है।

उदाहरण –

माँगने वाला आया द्वार,
वीर ने कर दिया सब दान।

इस वाक्य में दान देने का उत्साह है, अतः यह दानवीर है

अन्य उदाहरण – 

  • मस्तक की यह देह रहे या रहे न रहे,
    दानवीर कर्ण का यश जग में सदा रहे।
  • सिर काटकर भी दे सकता हूँ,
    माँगने वाला यदि आए।

3. दयावीर –

परिभाषा –  जब किसी व्यक्ति द्वारा दीन-दुखियों, असहायों और जरूरतमंदों की सहायता तथा उनकी रक्षा करने की भावना दिखाई जाती है, वहाँ दयावीर होता है।

उदाहरण – 

दीन-दुखी की सेवा करना,
अपना धर्म समझता वीर।

इस वाक्य में कमजोर और असहाय लोगों की सहायता करने के लिए उत्साह दिखाया गया है, इसलिए यह दयावीर का उदाहरण है।

अन्य उदाहरण – 

  • परहित सरिस धरम नहिं भाई।
    पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
  • शरणागत यह विकल विहग है, इसकी रक्षा मेरा धर्म।
    मांस काट निज देह का दूँ, चाहे छूटे प्राण का मर्म॥
  • कोई न मारे किसी जीव को, सब पर दया दिखाओ तुम।
    पीड़ित जीव की रक्षा हित, सर्वस्व लुटाओ तुम॥

4. धर्मवीर-

परिभाषा – जब कोई व्यक्ति धर्म, सत्य, न्याय और अपने कर्तव्य की रक्षा के लिए दृढ़ता से संघर्ष करता है, वहाँ धर्मवीर होता है।

उदाहरण – 

सत्य की राह न छोड़ी उसने,
चाहे कितने कष्ट सहे।

इस वाक्य में सत्य और धर्म के लिए कठिनाइयों को सहन करने के भाव है अतः यह धर्मवीर का उदाहरण है।

 अन्य उदाहरण – 

  • कह दो उनसे जो ख़रीदने आये हों तुम्हें
    हर भूखा आदमी बिकाऊ नहीं होता।
  • सृजन की थकन भूल जा देवता!
    अभी तो पड़ी है धरा अधबनी
  • जिसको छू लेने वाली हर पीड़ा
    जीवन में फिर जाती व्यर्थ नहीं

वीर रस और रौद्र रस में अंतर-

वीर रस और रौद्र रस दोनों में जोश और तीव्रता दिखाई दे सकती है, इसलिए परीक्षा में इनके बीच अंतर समझना जरूरी है। मुख्य अंतर यह है कि वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है, जबकि रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध है।

आधार वीर रस रौद्र रस
स्थायी भाव उत्साह क्रोध
मुख्य भावना साहस, शौर्य और पराक्रम क्रोध, आक्रोश और उग्रता
उद्देश्य किसी कार्य को साहसपूर्वक करना अपमान, अन्याय या अपराध के कारण क्रोधित होना
स्वभाव वीर और उत्साहपूर्ण उग्र और क्रोधपूर्ण
प्रमुख स्थिति युद्ध, देश की रक्षा, धर्म की रक्षा अपमान, अत्याचार, अन्याय या शत्रु के अपराध से उत्पन्न क्रोध
भाषा ओजपूर्ण और उत्साहवर्धक कठोर, उग्र और आक्रोशपूर्ण
उदाहरण सैनिक का युद्धभूमि में शत्रु से लड़ना किसी प्रिय व्यक्ति की हत्या पर अत्यंत क्रोधित होकर शत्रु को दंड देने के लिए उठ खड़ा होना

वीर रस FAQs –

प्रश्न- वीर रस किसे कहते है?

उत्तर- जहाँ किसी कार्य को करने के लिए मन में साहस, उत्साह और पराक्रम का भाव उत्पन्न हो, वहाँ वीर रस होता है

प्रश्न- वीर रस का स्थायी भाव क्या है?

उत्तर- वीर रस का स्थायी भाव  उत्साह होता है

प्रश्न- वीर रस के कितने भेद होते है?

उत्तर- वीर रस के प्रमुख चार भेद होते है ( युद्धवीर, दानवीर, दयावीर, धर्मवीर )

प्रश्न- वीर रस और रौद्र रस में क्या अंतर है?

उत्तर- वीर रस में उत्साह और साहस की भावना प्रधान होती है, जबकि रौद्र रस में क्रोध और उग्रता की भावना प्रधान होती है।

 

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