रौद्र रस किसे कहते है? परिभाषा और उदाहरण

रौद्र रस किसे कहते है?

परिभाषा- अनुचित या आवंछित स्थित तथा उसके कारण किसी व्यक्ति या वस्तु को देखकर को देखकर उत्पन्न क्रोध को रौद्र रस कहते है।

सरल शब्दों में – जब किसी अन्याय, अपमान, अत्याचार, शत्रुता या बुरी घटना के कारण मन में तीव्र क्रोध उत्पन्न होता है और उसी क्रोध का प्रभाव काव्य या साहित्य में दिखाई देता है, तो वहाँ रौद्र रस होता है।

  • इसमें क्रोध के कारण व्यक्ति का मुह लाल हो जाना, दांत पीसना, शस्त्र चलाना, गर्जन करना, भौंह चढ़ाना आदि भाव उत्पन्न होता है।

रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध होता है 

रौद्र रस के प्रमुख तत्व-

रौद्र रस के निर्माण में मुख्य रूप से चार तत्व माने जाते हैं—

स्थायी भाव = क्रोध
विभाव = क्रोध उत्पन्न करने वाले कारण
अनुभाव = क्रोध के कारण दिखाई देने वाली बाहरी चेष्टाएँ
संचारी भाव = क्रोध को बढ़ाने वाले सहायक भाव

इन्हें विस्तार से समझते हैं।

  • स्थायी भाव – रस के संदर्भ में स्थायी भाव वह मूल भाव होता है जो मन में स्थिर रूप से विद्यमान रहता है और विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों के सहयोग से रस के रूप में प्रकट होता है।

 

  • विभाव- जिस कारण से व्यक्ति के मन में क्रोध उत्पन्न होता है, उसे रौद्र रस का विभाव कहा जाता है।

उदाहरण – यदि कोई व्यक्ति किसी वीर का अपमान करता है और वीर को अत्यधिक क्रोध आता है, तो वीर का अपमान रौद्र रस का विभाव होगा।

  • अनुभाव – क्रोध उत्पन्न होने के बाद व्यक्ति के शरीर, चेहरे और व्यवहार में जो बाहरी परिवर्तन दिखाई देते हैं, उन्हें अनुभाव कहते हैं।

उदाहरण – 

लाल हुईं आँखें, तन काँपा,
वीर ने तलवार उठाई।

यहाँ लाल आँखें, शरीर का काँपना और तलवार उठाना रौद्र रस के अनुभाव हैं।

  • संचारी भाव – क्रोध के साथ उत्पन्न होने वाले अनेक अस्थायी भाव रौद्र रस को अधिक प्रभावशाली बनाते हैं। इन्हें संचारी भाव कहा जाता है।

रौद्र रस के प्रमुख उदाहरण –

  • अन्याय देखकर वीर गरजा, आँखों में अंगार जल उठा।
    शत्रु ने जब सीमा लाँघी, उसका क्रोध प्रचंड हुआ।
  • अपमान सुनकर वीर ने कहा, अब इसका बदला लेकर रहूँगा।
  • क्रोध से लाल हुए नयन, भृकुटि तन गई तत्काल।
    हाथ में लेकर शस्त्र वीर ने, किया शत्रु पर प्रहार।
  • श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्रोध से जलने लगे,
    सब शोक अपना भूलकर रण के लिए चलने लगे।
  • देखकर रणभूमि में शत्रु को, वीर का क्रोध बढ़ने लगा।
    लाल हुईं उसकी दोनों आँखें, हाथ में खड्ग चमकने लगा।
  • भृकुटि तनी, नयन लाल हुए, मुख से निकले अग्नि समान।
    क्रोध में काँपा वीर शरीर, गूँज उठा सारा मैदान।
  • अन्याय की सीमा जब टूटी, वीर का धैर्य भी टूट गया।
    क्रोध की ज्वाला ऐसी भड़की, शत्रु का साहस छूट गया।
  • लाल नयन, तन में क्रोध, भृकुटि तनी और मुख कठोर।
    शत्रु पर बरसी वीर की तलवार, गूँज उठा रण का हर छोर।

रौद्र रस और वीर रस में अंतर-

रौद्र रस और वीर रस दोनों में युद्ध, संघर्ष और पराक्रम का वर्णन मिल सकता है, इसलिए कई बार इनमें भ्रम हो जाता है। लेकिन दोनों के स्थायी भाव अलग-अलग होते हैं।

आधार रौद्र रस वीर रस
स्थायी भाव क्रोध उत्साह
मुख्य भावना क्रोध, रोष, आक्रोश और प्रतिशोध साहस, उत्साह, पराक्रम और शौर्य
उत्पत्ति का कारण अपमान, अन्याय, अत्याचार या शत्रु के प्रति क्रोध कठिन कार्य, युद्ध, धर्म, देश या कर्तव्य के प्रति उत्साह
व्यवहार व्यक्ति क्रोध में उग्र और आक्रामक हो जाता है व्यक्ति साहस और धैर्य के साथ कार्य करता है
वाणी कठोर, क्रोधपूर्ण और गरजने वाली उत्साहपूर्ण, प्रेरणादायक और आत्मविश्वासपूर्ण
शारीरिक भाव आँखें लाल होना, भौंहें तनना, दाँत पीसना आदि निर्भयता, दृढ़ता और आत्मविश्वास
मुख्य उद्देश्य शत्रु को दंड देना या बदला लेना विजय प्राप्त करना, रक्षा करना या कर्तव्य निभाना
उदाहरण अत्याचार देखकर वीर का क्रोधित होकर शत्रु पर टूट पड़ना देश की रक्षा के लिए वीर का उत्साहपूर्वक युद्ध करना

 

रौद्र रस FAQs-

प्रश्न- रौद्र रस किसे कहते है?

उत्तर- जहाँ क्रोध या गुस्से का भाव प्रमुख होता है, वहाँ रौद्र रस होता है

प्रश्न- रौद्र रस का स्थायी भाव क्या होता है?

उत्तर- रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध होता है

प्रश्न- रौद्र रस में कौन सा भाव उत्पन्न होता है?

उत्तर- इसमें मुह लाल हो जाना, दांत पीसना, शस्त्र चलाना, गर्जन करना, भौंह चढ़ाना आदि भाव उत्पन्न होता है

प्रश्न- रौद्र रस और वीर रस में क्या अंतर है?

उत्तर- रौद्र रस में क्रोध और आक्रोश की प्रधानता होती है, जबकि वीर रस में उत्साह, साहस और पराक्रम की प्रधानता होती है

 

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