श्रृंगार रस किसे कहते है? परिभाषा, भेद और उदाहरण

श्रृंगार रस किसे कहते है?

  • श्रृंगार रस को रसराज या रसपति कहा जाता है

परिभाषा- जहाँ स्त्री-पुरुष के परस्पर प्रेम, आकर्षण, सौंदर्य, मिलन या विरह से उत्पन्न भावों की कलात्मक अभिव्यक्ति होती है, वहाँ श्रृंगार रस होता है।

सरल शब्दों में – जहाँ पर नायक – नायिका की बीच प्रेम में मधुर मिलन का अथवा अलगाव का बोध होता है वहाँ श्रृंगार रस होता है।

श्रृंगार रस का स्थायी भाव ‘रति’ होता है

रति का अर्थ है— किसी प्रिय व्यक्ति के प्रति प्रेम, अनुराग और आकर्षण।

श्रृंगार रस के भेद-

श्रृंगार रस के मुख्यतः दो भेद माने जाते हैं

  1. संयोग श्रृंगार

  2. वियोग श्रृंगार

दोनों को विस्तार से समझते है-

1.संयोग श्रृंगार-

परिभाषा- जहाँ पर नायक-नायिका के संयोग ( प्रेम में मधुर मिलन ) या प्रकृति की सुन्दरता का वर्णन किया गया हो वहाँ संयोग श्रृंगार होता है।

सरल शब्दों में – प्रेमी-प्रेमिका के मिलन और मिलन से उत्पन्न आनंद का वर्णन संयोग श्रृंगार कहलाता है।

उदाहरण –

चाँदनी रात में दोनों मिले,
अधरों पर मुस्कान खिली।
नयनों से नयनों की बात हुई,
प्रेम की सुंदर बरसात हुई।

यहाँ नायक-नायिका के मिलन और प्रेमपूर्ण भावों का वर्णन है, इसलिए यह संयोग श्रृंगार है।

अन्य उदाहरण –

  • प्रिय को सामने देखकर नायिका मुस्कुराई और लज्जा से अपनी आँखें झुका लीं।
  • वसंत की सुंदर ऋतु में फूलों से भरे उपवन में नायक और नायिका एक-दूसरे से प्रेमपूर्ण बातें कर रहे हैं।
  • वसंत की सुंदर ऋतु में फूलों से भरे उपवन में नायक और नायिका एक-दूसरे से प्रेमपूर्ण बातें कर रहे हैं।
  • चाँदनी रात में प्रियतम के आने पर नायिका के चेहरे पर खुशी छा गई और दोनों देर तक प्रेमपूर्वक बातें करते रहे।
  • फूलों से सजे उपवन में नायक ने नायिका को देखकर मुस्कुराया, तो नायिका ने लज्जा से अपनी आँखें झुका लीं।
  • नायक ने नायिका का हाथ थाम लिया और दोनों एक-दूसरे को प्रेमभरी दृष्टि से देखने लगे।
  • मंद-मंद बहती हवा और चाँदनी रात में नायक-नायिका एक-दूसरे से प्रेमपूर्ण बातें कर रहे थे।
  • कहत, नटत, रीझत, खिझत,मिलत, खिलत, लजियात। भरे भौन में करत हैं,नैनन ही सों बात॥
  • नहिं परागु, नहिं मधुर मधु, नहिं विकासु इहि काल। अली कली ही सौं बिंध्यो,आगे कौन हवाल॥
  • बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।सौंह करै, भौंहनु हँसे, दैन कहै नटि जाय॥

2. वियोग श्रृंगार-

वियोग श्रृंगार को विप्रलंभ श्रृंगार भी कहा जाता है।

परिभाषा- जब प्रेमी-प्रेमिका के बीच प्रेम तो विद्यमान रहता है, लेकिन मिलन न होने के कारण विरह, व्याकुलता, प्रतीक्षा, दुःख और प्रिय की स्मृति उत्पन्न होती है, वहाँ वियोग श्रृंगार होता है।

सरल शब्दों में- प्रिय के वियोग या बिछोह से उत्पन्न प्रेम, विरह, व्याकुलता और दुःख का काव्यात्मक वर्णन वियोग श्रृंगार कहलाता है।

उदाहरण –

हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी।
तुम देखी सीता मृगनैनी॥

इस वाक्य में सीता राम से दूर हो गई हैं। राम उनकी खोज में वन-वन भटक रहे हैं और हर जगह सीता के बारे में पूछ रहे हैं। राम वन के पक्षियों, पशुओं और भौंरों से पूछते हैं कि क्या उन्होंने मृगनयनी सीता को कहीं देखा है।
यहाँ प्रेम + प्रिय का बिछोह + व्याकुलता + खोज दिखाई देती है। इसलिए यह वियोग श्रृंगार का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

अन्य उदाहरण – 

  • ऊधो, मन न भए दस बीस। एक हुतो सो गयौ श्याम संग
  • अति सूधो सनेह को मारग है, जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं।
  • पिउ सो कहेउ संदेसड़ा, हे भौंरा हे काग। सो धनि बिरहै जरि मुई, तेहि के धुवाँ हम्ह लाग॥
  • मधुकर! श्याम हमारे चोर। मन हरि लीनो, तनु हरि लीनो, नैनन की नहिं ओर॥
  • ऊधो, मन न भए दस बीस। एक हुतो सो गयौ श्याम संग, को अवराधै ईस॥
  • प्रिय के आने की आशा में नायिका हर शाम द्वार की ओर देखती रहती है।
  • कृष्ण के मथुरा चले जाने के बाद गोपियाँ उनके वियोग में व्याकुल हैं।
  • जिस बगीचे में दोनों साथ बैठते थे, उसी बगीचे में अकेली बैठकर नायिका प्रिय को याद कर रही है।
  • जिस बगीचे में दोनों साथ बैठते थे, उसी बगीचे में अकेली बैठकर नायिका प्रिय को याद कर रही है।
  • प्रिय के बिना नायिका उदास बैठी है और बार-बार उसके आने की राह देख रही है।

संयोग श्रृंगार और वियोग श्रृंगार में अंतर-

संयोग श्रृंगार में प्रिय के मिलन से उत्पन्न प्रेम और आनंद का वर्णन होता है, जबकि वियोग श्रृंगार में प्रिय के बिछोह से उत्पन्न प्रेम, विरह और व्याकुलता का वर्णन होता है।

नीचे दिए गए कॉलम में इन दोनो के अंतरों को विस्तार से समझाया गया है-

आधार संयोग श्रृंगार वियोग श्रृंगार
अर्थ प्रिय के साथ मिलन की स्थिति प्रिय से बिछोह की स्थिति
मुख्य भाव मिलन का आनंद और प्रसन्नता विरह, दुःख और व्याकुलता
स्थिति नायक-नायिका एक-दूसरे के साथ होते हैं नायक-नायिका एक-दूसरे से दूर होते हैं
प्रेम की अभिव्यक्ति प्रेमालाप, मुस्कान, चितवन, हास-परिहास आदि स्मृति, प्रतीक्षा, आँसू, आहें और व्याकुलता आदि
अनुभाव मुस्कुराना, लज्जा, प्रेमपूर्ण दृष्टि, आलिंगन आदि रोना, आहें भरना, उदास रहना, बेचैनी आदि
प्रमुख संचारी भाव हर्ष, लज्जा, चपलता, औत्सुक्य आदि विषाद, चिंता, स्मृति, औत्सुक्य, दैन्य आदि
उद्दीपन चाँदनी, वसंत, फूल, सुगंध, मंद पवन आदि प्रिय की स्मृतियाँ, एकांत, प्रिय से जुड़ी वस्तुएँ आदि
काव्यगत उदाहरण बिहारी के नायक-नायिका के प्रेमपूर्ण प्रसंग सूरदास के भ्रमरगीत में गोपियों का कृष्ण-विरह
सरल उदाहरण प्रिय को सामने देखकर नायिका का मुस्कुराना प्रिय के दूर जाने पर नायिका का रोना
मुख्य शब्द मिलन + आनंद बिछोह + विरह

 

श्रृंगार रस FAQs-

प्रश्न- श्रृंगार रस किसे कहते है?

उत्तर- जहाँ पर नायक – नायिका की बीच प्रेम में मधुर मिलन का अथवा अलगाव का बोध होता है वहाँ श्रृंगार रस होता है।

प्रश्न- श्रृंगार रस का स्थायी भाव क्या होता है?

उत्तर- रति

प्रश्न- श्रृंगार रस के कितने भेद होते है?

उत्तर- श्रृंगार रस के दो भेद होते है- संयोग श्रृंगार और वियोग श्रृंगार

प्रश्न- श्रृंगार रस के किस भेद में प्रेमी-प्रेमिका के मिलन और मिलन से उत्पन्न आनंद का वर्णन किया जाता है?

उत्तर- संयोग श्रृंगार में

प्रश्न- श्रृंगार रस के किस भेद में  प्रिय के वियोग या बिछोह से उत्पन्न प्रेम, विरह, व्याकुलता और दुःख का काव्यात्मक वर्णन किया जाता है?

उत्तर- वियोग श्रृंगार

प्रश्न- वियोग श्रृंगार का दूसरा नाम क्या है?

उत्तर- विप्रलंभ श्रृंगार

 

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