मानवीकरण अलंकार किसे कहते है? अर्थ, परिभाषा, और उदाहरण – हिन्दी व्याकरण

मानवीकरण अलंकार किसे कहते है?

मानवीकरण दो शब्दों मानव और करण से मिलकर बना है-

  • मानव = मनुष्य 
  • कारण = बनाना

अर्थात किसी अमानवीय वस्तु को मनुष्य के सामान बना देना या उसमे मानवीय गुणों का आरोप करना मानवीकरण कहलाता है

परिभाषा-  जिस काव्य में जड़ ( निर्जीव ) पर चेतन ( सजीव ) का आरोप होता है, अर्थात जहाँ निर्जीव वस्तु का का वर्णन सजीव वस्तु की तरह किया गया हो, वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है।

सरल शब्दों में = जब निर्जीव वस्तुओं या प्रकृति को मनुष्य के समान व्यवहार करते हुए प्रस्तुत किया जाए, तो वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है।

उदाहरण- 

हँसती हुई कलियाँ कहती हैं,
आओ मधुर वसंत आया है।

यहाँ कलियाँ निर्जीव है, लेकिन उन्हें हँसते और बोलते हुए बताया गया है। हँसना और बोलना मनुष्य की क्रियाएँ है, इसलिए यहाँ मानवीकरण अलंकार है

मानवीकरण अलंकार की मुख विशेषताएँ-

  • मानवीकरण अलंकार अर्थालंकार के अंतर्गत आता है
  • इसमें निर्जीव वस्तुओं प्रकृति या पशु-पक्षियों में मनुष्य के गुणों का आरोप किया जाता है।
  • निर्जीव वस्तुओं को मनुष्य की तरह हँसते, रोते, बोलते, गाते, चलते, सोते, जागते आदि दिखाया जाता है।
  • इसमें प्रकृति की वस्तुओं जैसे सूर्य, चंद्रमा, नदी, पर्वत, हवा, बादल, फूल, धरती आदि को मानव के समान व्यवहार करते हुए प्रस्तुत किया जाता है।
  • इसमें निर्जीव वस्तुओं में प्रेम, क्रोध, दुःख, प्रसन्नता, लज्जा, करुणा, उत्साह आदि मानवीय भावनाएँ दिखाई जाती हैं।
  • इसमें कवि अपनी कल्पना के माध्यम से निर्जीव वस्तुओं को मानव जैसा रूप देता है।
  • मानवीकरण के कारण निर्जीव वस्तुएँ भी सजीव और प्रभावशाली प्रतीत होने लगती है

मानवीकरण अलंकार के उदाहरण –

  • हँसती हैं कलियाँ बागों में।
  • नदी गा-गाकर चलती है।
  • हवा धीरे-धीरे कानों में कुछ कह रही है।
  • चाँद मुस्कुराकर धरती को देख रहा है।
  • सूरज ने अपनी सुनहरी किरणों से धरती को जगाया।
  • बादल रो-रोकर बरस रहे हैं।
  • धरती माँ अपने बच्चों को गोद में लिए बैठी है
  • फूलों ने सुबह मुस्कुराकर मेरा स्वागत किया।
  • रात चुपचाप अपने आँचल में तारों को समेटे बैठी थी।
  • पर्वत सिर उठाकर आकाश से बातें कर रहा है।
  • मेघ आये बड़े बन-ठन के, सँवर के
  • सन्ध्या घनमाला की ओढ़े रंग बिरंगी छींट।
  • सागर के उर पर नाच-नाच करती हैं लहरें मधुर गान।
  • धीरे-धीरे हिम आच्छादन, हटने लगा धरातल से।
    जगी वनस्पतियाँ अलसायी, मुख धोती सीतल जल से।।
  • छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाए,
    मत झुको अनर्थ पर, भले ही व्योम फट जाए।

मानवीकरण अलंकार और अतिशयोक्ति अलंकार में अंतर-

मानवीकरण और अतिशयोक्ति दोनों अर्थालंकार हैं, लेकिन दोनों में काव्य-सौंदर्य उत्पन्न करने का तरीका अलग होता है। मानवीकरण में निर्जीव या प्रकृति की वस्तुओं को मनुष्य के गुण दिए जाते हैं, जबकि अतिशयोक्ति में किसी बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है।

आधार मानवीकरण अलंकार अतिशयोक्ति अलंकार
1. अर्थ निर्जीव वस्तुओं या प्रकृति में मानवीय गुणों का आरोप किया जाता है। किसी वस्तु, व्यक्ति या घटना का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया जाता है।
2. मुख्य आधार मानवीय गुण, भाव या क्रिया अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर कथन
3. वास्तविकता निर्जीव वस्तु को मनुष्य जैसा व्यवहार करते हुए दिखाया जाता है। बात को इतना बढ़ा दिया जाता है कि वह सामान्य रूप से संभव या वास्तविक न लगे
4. उद्देश्य निर्जीव वस्तुओं को सजीव और प्रभावशाली बनाना। वर्णन को अधिक प्रभावशाली और रोचक बनाना।
5. प्रमुख पहचान प्रकृति/वस्तु हँसती, रोती, बोलती, गाती, रूठती आदि दिखाई देती है। किसी बात को बहुत अधिक बढ़ाकर बताया जाता है।
6. उदाहरण “फूल मुस्कुरा रहे हैं।” “उसकी आवाज से पूरा आकाश काँप उठा।”
7. अलंकार का प्रकार अर्थालंकार अर्थालंकार

 

उदाहरण से समझते है-

  • मानवीकरण –

फूल हँस-हँसकर मेरा स्वागत कर रहे हैं।

इस वाक्य में फूल निर्जीव है, लेकिन उन्हें मनुष्य की तरह हँसते और स्वागत करते हुए बताया गया है, इसलिए यह मानवीकरण अलंकार है

  • अतिशयोक्ति

उसकी आवाज सुनकर पूरा आकाश काँप उठा।

इस वाक्य में आवाज के प्रभाव को बहुत बढ़ा – चढ़ाकर बताया गया है। वास्तव में किसी व्यक्ति की आवाज से पूरा आकाश काँपना संभव नही है, इसलिए यह अतिशयोक्ति अलंकार है

मानवीकरण अलंकार FAQs-

प्रश्न- मानवीकरण अलंकार किसे कहते है?

उत्तर- जब निर्जीव वस्तुओं या प्रकृति को मनुष्य के समान व्यवहार करते हुए प्रस्तुत किया जाए तो उसे मानवीकारण अलंकार कहते है

प्रश्न- मानवीकरण का अर्थ क्या है?

उत्तर- किसी अमानवीय वस्तु को मनुष्य के सामान बना देना या उसमे मानवीय गुणों का आरोप करना मानवीकरण कहलाता

प्रश्न- मानवीकरण अलंकार और अतिशयोक्ति अलंकार में क्या अंतर है?

उत्तर- मानवीकरण में निर्जीव प्रकृति पर मानवीय क्रियाओं का आरोप होता है, जबकि अतिशयोक्ति में किसी बात को बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाता है

 

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