करुण रस किसे कहते है? परिभाषा, भेद और उदाहरण

करुण रस किसे कहते है?

करुण रस का संबंध दुःख, शोक, वियोग और पीड़ा से है।

परिभाषा –जब किसी प्रिय व्यक्ति के वियोग, मृत्यु, विनाश, विपत्ति या दुखद घटना के कारण हृदय में शोक और दुःख का भाव उत्पन्न होता है तथा काव्य या साहित्य में उसका मार्मिक वर्णन किया जाता है, वहाँ करुण रस होता है।

सरल शब्दों में-  किसी प्रिय व्यक्ति के चिर विरह या मरण से जो शोक उत्पन्न होता है उसे करुण रस कहते है।

  • करुण रस का स्थायी भाव ‘शोक’ होता है 
  • भवभूति ने करुण रस को रसराज कहा है 
  • यम को करुण रस का देवता माना जाता है

उदाहरण – 

राम राम कहि राम कहि, राम राम कहि राम।
तनु परिहरि रघुवीर हित, भा नृपु सुरपुर धाम॥

इस काव्य में राम के वियोग में राजा दशरथ की स्थिति अत्यंत दयनीय हो जाती है। वे लगातार राम का नाम लेते हैं और अंततः राम-वियोग के दुःख में अपने प्राण त्याग देते हैं। अतः यह करुण रस है।

करुण रस की प्रमुख विशेषताएँ- 

  • इस रस में दुःख, पीड़ा, शोक और विषाद की प्रधानता होती है
  • प्रिय व्यक्ति का बिछड़ना, मृत्यु, विनाश, विपत्ति आदि करुण रस के प्रमुख आधार हैं।
  • रोना, विलाप करना, छाती पीटना, आहें भरना, उदास होना आदि इसके प्रमुख अनुभाव है
  • वियोग में प्रिय की स्मृति, उसकी चिंता और उससे मिलने की इच्छा जैसे भाव उत्पन्न होते हैं।

करुण रस के प्रमुख उदाहरण –

  • मणि खोये भुजंग-सी जननी, फन-सा पटक रही थी शीश,अंधी आज बनाकर मुझको किया न्याय तुमने जगदीश।
  • शोक विकल सब रोवही रानी, रूप शील बल देख बखानी।करहि विलाप अनेक प्रकारा, परहि भूमि तल बारहिं बारा।
  • देख सुदामा की दीन दशा, करुणा कर के करुणानिधि रोए।पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सो पग धोए।
  • हाय! रुक गया यहीं संसार, बना सिंदूर अनल अंगार,वातहत लतिका वह सुकुमार, पड़ी है छिन्नाधार।
  • कंदर्प के अद्य उस हृदय-शेष पर, बैठी थी जो मुककुलित नयन कर,देख उसे सुखी अब यह जीवन, क्या रह गया शेष मेरे मन?
  • नीर भरे नैनन ढले, कुलत भई एक बात,आज हमारी ब्याह की, बरसों बीत गई रात।
  • जलती थी भूख त्रिशा की, उसके अंतर में होली,कल से ही प्यास लगी, हो रहा हृदय मतवाला।
  • हे राम! तुम्हें कैसे समझाऊँ, यह जीवन कितना सूना है,जो अपने थे, वे छूट गए, यह वज्रपात अनहोना है।
  • बिछड़न की इस भारी वेला में, सूना हुआ दरबार मेरा,कोई नहीं है कहने वाला, आ लौट के घर आ जा भैया।

करुण रस और वियोग श्रृंगार में अंतर-

दोनों में दुःख और वियोग दिखाई दे सकता है, इसलिए इनके बीच भ्रम होता है। मुख्य अंतर यह है कि वियोग श्रृंगार में प्रेम (रति) प्रधान होता है, जबकि करुण रस में शोक प्रधान होता है।

आधार करुण रस वियोग श्रृंगार
स्थायी भाव शोक रति (प्रेम)
मुख्य भाव दुःख, पीड़ा और शोक प्रेम, विरह और प्रिय से मिलने की इच्छा
मुख्य कारण मृत्यु, विनाश, विपत्ति, अत्यंत दुखद घटना आदि प्रिय व्यक्ति से बिछुड़ना या मिलन न होना
प्रेम की स्थिति प्रेम होना आवश्यक नहीं है प्रेम होना आवश्यक है
मिलन की इच्छा आवश्यक नहीं सामान्यतः प्रिय से मिलने की तीव्र इच्छा रहती है
प्रमुख अनुभाव रोना, विलाप, आहें भरना, छाती पीटना आदि आँसू, उदासी, प्रिय की स्मृति, प्रतीक्षा, व्याकुलता आदि
प्रभाव हृदय में शोक और करुणा उत्पन्न करता है हृदय में प्रेमयुक्त विरह और व्याकुलता उत्पन्न करता है
उदाहरण पुत्र की मृत्यु पर माता का विलाप प्रिय के दूर चले जाने पर नायिका का विरह
प्रसिद्ध उदाहरण दशरथ का राम-वियोग गोपियों का कृष्ण-विरह

करुण रस FAQs-

प्रश्न- करुण रस किसे कहते है?

उत्तर- जब किसी प्रिय व्यक्ति या वस्तु के नष्ट होने, बिछड़ जाने या बड़े दुख के कारण हृदय में जो शोक का भाव उत्पन्न होता है, उसे करुण रस कहते है

प्रश्न- करुण रस का स्थायी भाव क्या होता है?

उत्तर- शोक

प्रश्न- करुण रस और वियोग श्रृंगार में क्या अंतर है?

उत्तर- करुण रस में दुःख और शोक प्रधान होता है, जबकि वियोग श्रृंगार में प्रिय से बिछड़ने का प्रेम और विरह प्रधान होता है

 

August Current Affairs PDF Image