रस किसे कहते है? परिभाषा, अंग, भेद और उदाहरण

रस किसे कहते है

रस का शाब्दिक अर्थ है – आनंद की अनुभूति 

  • रस ‘सृ’ धातु से बना है, ‘सृ’ का अर्थ है बहते जाना
  • रस को काव्य की आत्मा या प्राणतत्व माना जाता है

परिभाषा– काव्य को पढने या सुनने में और नाटक को देखने से पाठक ( पढने वाले ) और श्रोता ( सुनने वाले ) को जो आनंद की अनुभूति होती है, उसे रस कहते है।

  • रस की उत्पत्ति को सर्वप्रथम परिभाषित करने का श्रेय आचार्य भरतमुनि को जाता है। उन्होंने अपने प्रसिद्द ग्रन्थ नाट्यशास्त्र में सर्वप्रथम रस का उलेख करते हुए रस की परिभाषा दी जो इस प्रकार है-

विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः 

अर्थात विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी ( संचारी ) भावों से रस की निष्पत्ति होती है।

  • उपनिषदों में सर्वप्रथम रस का प्रयोग तैत्तिरीय उपनिषद में मिलता है
  • भट्ट नायक के अनुसार रस की न उत्पत्ति होती है और न ही अभिव्यक्ति वरन भुक्ति होती है।
  • भरतमुनि के रससूत्र के प्रथम व्याख्याकार भट्टल्लोलट है।
  • भरतमुनि के रससूत्र में स्थायी भाव का वर्णन नही किया गया है।
  • आचार्य भरतमुनि रस के प्रतिष्ठापक आचार्य है।
  • आचार्य भवभूति के अनुसार करुण ही एकमात्र रस है।
  • आचार्य अभिनव गुप्त ने नवमोदपि शान्तो रस कह कर 9 रसों को काव्य में स्वीकार है।
  • आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार जिस भांति आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी भांति ह्रदय की मुक्तावस्था रस दशा कहलाती है।

रस के अंग ( अवयव )-

हिन्दी व्याकरण के अंतर्गत रस के चार अंग ( अवयव ) माने गए है-

  1. विभाव 
  2. अनुभाव 
  3. संचारी भाव 
  4. स्थायी भाव 

                                                           1. विभाव- 

जो व्यक्ति, पदार्थ अथवा अथवा तत्व किसी अन्य व्यक्ति के ह्रदय में भावों को जगाते उन्हें विभाव कहते है।

  • विभव ही स्थायी भावों को अनुभूति योग्य बनाता है
  • विभाव का शाब्दिक अर्थ कारण होता है, अर्थात स्थायी भाव के उत्पत्ति के कारण को विभाव कहते है

विभाव के दो भेद होते है-

  1. आलंबन विभाव 
  2. उद्दीपन विभाव 

1. आलंबन विभाव – जिसका साहारा पाकर स्थायी भाव जागते है, उसे आलंबन विभाव कहते है।

जैसे- नायक- नायिका

आलंबन के दो भेद होते है-

( I )- आश्रयालंबन- जिसके ह्रदय में भाव जगे उसे आश्रयालंबन कहते है

( II ) – विषयालंबन- जिसके कारण ह्रदय में भाव जगे उसे विषयालंबन कहते है

उदाहरण-

श्रीराम को देखकर सीता के मन में प्रेम उत्पन्न हो गया।

  • सीता = विषयालंबन
  • राम = आश्रयालंबन

यहाँ सीता के मन में प्रेम का भाव उत्पन्न हो रहा है, जिसका विषय राम है। भाव उत्पन होने का कारण राम है इसलिए राम विषयालंबन है

2. उद्दीपन विभाव – जिन वस्तुओं या परिस्थितियों को देखकर स्थायी भाव तीव्र होते है या होने लगते है, उसे उद्दीपन विभाव कहते है

जैसे- चाँदनी रात, नायक नायिका की शारीरिक चेष्टाएँ, एकांत स्थान, कोयल की आवाज, उद्धान, युद्ध के बाजे, गर्जना तर्जना आदि

                                                            2. अनुभाव 

अनुभाव को शब्दों अनु + भाव से मिलकर बना है जिसमे अनु का अर्थ है बाद में एवं भाव का अर्थ है विचार 

भावों के अनुसरण या अनुकरण करने वाले मनोभाव को व्यक्त करने वाली शारीरिक एवं मानसिक चेष्टाएँ अनुभाव कहलाती है।

अनुभाव के मुख्यतः चार ( 4 ) भेद होते है 

  • ( I ) – कायिक (आंगिक) अनुभाव
  • ( II ) – वाचिक अनुभाव 
  • ( III ) – आहार्य अनुभाव 
  • ( IV ) – सात्विक अनुभाव 

( I ) – कायिक (आंगिक) अनुभाव- कायिक शब्द काया से मिलकर बना है जिसका अर्थ है शरीर।

किसी विषय को देखकर की जाने वाली शारीरिक क्रिया – कलाप कायिक अनुभाव कहलाती है।

  • कायिक अनुभाव जानबूझकर किये जाते है 

उदाहरण –  प्रिय व्यक्ति को सामने देखकर नायिका लज्जा के कारण अपना सिर झुका लेती है।

क्योंकि नायिका के मन में उत्पन्न भाव के कारण उसके शरीर से एक बाहरी क्रिया (सिर झुकाना) हुई। इसलिए इसे कायिक अनुभाव कहा जाएगा।

( II ) – वाचिक अनुभाव- वाचिक शब्द वाच्य से बना है जिसका अर्थ होता है कथन 

मन में उत्पन्न भावों की अभिव्यक्ति जब वाणी, शब्द, स्वर या बोलने के ढंग के माध्यम से होती है, तो उसे वाचिक अनुभाव कहते हैं।

उदाहरण – शेर को देखकर सभी चिल्लाने लगे

इस वाक्य में चिल्लाना वाचिक अनुभाव है

( III ) – आहार्य अनुभाव- आहार्य का शाब्दिक अर्थ है – वेशभूषा

भाव की अभिव्यक्ति के लिए वेशभूषा, आभूषण, श्रृंगार, रूप-सज्जा या बाहरी रूप में किए गए परिवर्तन को आहार्य अनुभाव कहते हैं।

उदाहरण – एक नायिका अपने प्रिय से मिलने के लिए सुंदर वस्त्र पहनती है, आभूषण धारण करती है और श्रृंगार करती है।

यहाँ सुंदर वस्त्र, आभूषण और श्रृंगार आहार्य अनुभाव हैं, क्योंकि इनके माध्यम से उसके प्रेम और प्रसन्नता के भाव की बाहरी अभिव्यक्ति हो रही है।

( IV ) – सात्विक अनुभाव- सात्त्विक अनुभाव वे अनुभाव हैं, जो मन में उत्पन्न तीव्र भावों के कारण शरीर में स्वतः और अनायास उत्पन्न होते हैं। इन पर व्यक्ति का स्वेच्छा से नियंत्रण नहीं होता।

सात्विक अनुभाव स्वतः उत्पन्न होते है 

भरतमुनि के अनुसार सात्विक अनुभाव की संख्या आठ ( 8 ) है- 

  1. स्तंभ — शरीर का जड़ या स्थिर हो जाना
  2. स्वेद — पसीना आना
  3. रोमांच — शरीर के रोएँ खड़े होना
  4. स्वरभंग — आवाज में बदलाव या रुकावट
  5. कंप — शरीर का काँपना
  6. वैवर्ण्य — चेहरे का रंग बदलना
  7. अश्रु — आँसू आना
  8. प्रलय — मूर्छित या चेतनाहीन हो जाना

                                                                   3. संचारी भाव 

जो भाव ह्रदय में अल्पकाल तक संचरण करके चले जाते है उन्हें संचारी भाव कहते है। संचारी भाव  का दूसरा नाम व्यभिचारी भाव होता है।

  • संचारी भाव संचरणशील, विचरण करने वाले नही, ये क्षणजीवी होने के कारण शीघ्र ही विलीन हो जाते है
  • संचारी भावो की संख्या 33 होती है
  • छल नामाक 34 वां संचारी भाव मानने वाले आचार्य कवी देव है

संचारी भावो की संख्या – 

  1. निर्वेद — संसार की वस्तुओं, सुखों या परिस्थितियों के प्रति मन में उत्पन्न होने वाली उदासीनता या विरक्ति।
  2. ग्लानि — अपने किसी कार्य, गलती या स्थिति के कारण मन में उत्पन्न होने वाला पछतावा, खेद या आत्म-हीनता का भाव।
  3. शंका — किसी व्यक्ति, वस्तु, घटना या बात के संबंध में उत्पन्न होने वाला संदेह या अनिश्चितता का भाव।
  4. असूया — दूसरे व्यक्ति के गुण, सफलता, सम्मान या सुख को देखकर उसके प्रति उत्पन्न होने वाला ईर्ष्या या दोष निकालने का भाव।
  5. मद — धन, पद, शक्ति, सौंदर्य या सफलता आदि के कारण मन में उत्पन्न होने वाला अहंकार या घमंड।
  6. श्रम — अधिक परिश्रम, कार्य या यात्रा के कारण शरीर और मन में उत्पन्न होने वाली थकान।
  7. आलस्य — किसी कार्य को करने की इच्छा न होने तथा शरीर और मन में उत्पन्न होने वाली सुस्ती या निष्क्रियता।
  8. दैन्य — दुःख, गरीबी, असहायता या विपत्ति के कारण मन में उत्पन्न होने वाला दीनता और हीनता का भाव।
  9. चिंता — किसी समस्या, संकट, भविष्य की घटना या अनिश्चित परिणाम के कारण मन में उत्पन्न होने वाली व्याकुलता या मानसिक परेशानी।
  10. मोह — किसी व्यक्ति, वस्तु या संबंध के प्रति उत्पन्न होने वाला अत्यधिक लगाव, आसक्ति या विवेकहीनता का भाव।
  11. स्मृति — पहले देखी, सुनी या अनुभव की गई किसी घटना, व्यक्ति या वस्तु का मन में पुनः याद आना।
  12. धृति — दुःख, संकट या विपरीत परिस्थितियों में भी मन को स्थिर रखने वाला धैर्य, साहस और मानसिक दृढ़ता का भाव।
  13. व्रीड़ा — किसी कार्य, परिस्थिति या लोगों के सामने आने पर मन में उत्पन्न होने वाली लज्जा, संकोच या झिझक।
  14. चपलता — मन, वाणी या शरीर की अस्थिरता, चंचलता और एक स्थान पर स्थिर न रहने का भाव।
  15. हर्ष — प्रिय वस्तु की प्राप्ति, सफलता या सुखद समाचार से मन में उत्पन्न होने वाला अत्यधिक आनंद या प्रसन्नता।
  16. आवेग — अचानक उत्पन्न होने वाली तीव्र मानसिक उत्तेजना या भावनात्मक हलचल, जिसके कारण व्यक्ति तुरंत प्रतिक्रिया करता है।
  17. जड़ता — भय, दुःख, आश्चर्य या आघात के कारण कुछ समय के लिए मन और शरीर की क्रियाओं का रुक जाना या निष्क्रिय हो जाना।
  18. गर्व — अपनी योग्यता, सफलता, शक्ति, धन या किसी उपलब्धि के कारण मन में उत्पन्न होने वाला अभिमान या गौरव का भाव।
  19. विषाद — किसी प्रिय वस्तु या व्यक्ति के वियोग, असफलता अथवा दुःख के कारण उत्पन्न होने वाली गहरी उदासी या निराशा।
  20. औत्सुक्य — किसी वस्तु, घटना, व्यक्ति या परिणाम को जानने या प्राप्त करने की तीव्र इच्छा, उत्सुकता या बेचैनी।
  21. निद्रा — शरीर और मन की वह अस्थायी अवस्था जिसमें चेतना बाहरी संसार से कम हो जाती है और व्यक्ति सो जाता है।
  22. अपस्मार — अत्यधिक मानसिक या शारीरिक विक्षोभ के कारण उत्पन्न होने वाली मूर्छा, चेतना-विकार या असामान्य अवस्था।
  23. स्वप्न — निद्रा की अवस्था में मन में दिखाई देने वाले कल्पित दृश्य, घटनाएँ या अनुभव।
  24. प्रबोध — निद्रा, अज्ञान या मूर्छा से जागने तथा चेतना प्राप्त होने की अवस्था।
  25. अमर्ष — अपमान, अन्याय या तिरस्कार को सहन न कर पाने से उत्पन्न होने वाला क्रोध, असहिष्णुता या प्रतिकार की भावना।
  26. अवहित्था — अपने मन में उपस्थित वास्तविक भाव को दूसरों से छिपाने या उसे प्रकट न करने की अवस्था।
  27. उग्रता — अत्यधिक क्रोध, कठोरता या उत्तेजना के कारण उत्पन्न होने वाला तीव्र और कठोर व्यवहार का भाव।
  28. मति — किसी विषय के बारे में विचार करने के बाद मन में उत्पन्न होने वाला निश्चय, बुद्धि, विचार या निर्णय का भाव।
  29. व्याधि — बीमारी या शारीरिक कष्ट के कारण मन और शरीर में उत्पन्न होने वाला दुर्बलता, पीड़ा या बेचैनी का भाव।
  30. उन्माद — अत्यधिक प्रेम, दुःख, भय या मानसिक आघात के कारण उत्पन्न होने वाली मानसिक अस्थिरता या विवेकहीन अवस्था।
  31. मरण — अत्यधिक दुःख, वियोग या संकट के कारण उत्पन्न होने वाला मृत्यु का भाव या मरने की इच्छा।
  32. त्रास — भयावह या संकटपूर्ण घटना को देखकर अथवा अनुभव करके मन में उत्पन्न होने वाला भय, आतंक या घबराहट।
  33. वितर्क — किसी विषय या घटना के संबंध में मन में उत्पन्न होने वाला तर्क, अनुमान, विचार या संभावनाओं पर विचार करने का भाव।

                                                                        4. स्थायी भाव

मनुष्य के हृदय में रहने वाले वे स्थिर और प्रधान भाव, जो उचित विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से रस के रूप में परिणत हो जाते हैं, उन्हें स्थायी भाव कहते हैं।

  • स्थायी भाव  का मतलब प्रधान होता है
  • स्थायी भाव की परिपक्व अवस्था को ही रस कहते है
  • स्थायी भाव को संचारी भाव का मित्र भी कहते है
  • भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार रसो की संख्या आठ ( 8 ) है, क्योंकि भरतमुनि शांत रस को रस नही मानते है
  • मूल रूप से रसो की संख्या 9 है और 9 ही स्थायी भाव है
  • 9 वां रस शांत रस को अभिनवगुप्त ने माना है तथा आचार्य उद्भट ने माना है

परम्परागत रूप से 9 रसों के 9 स्थायी भाव माने जाते हैं। जो इस प्रकार है-

क्रम रस स्थायी भाव
1. श्रृंगार रस रति
2. हास्य रस हास
3. करुण रस शोक
4. रौद्र रस क्रोध
5. वीर रस उत्साह
6. भयानक रस भय
7. बीभत्स रस जुगुप्सा
8. अद्भुत रस विस्मय
9. शांत रस निर्वेद

श्रृंगार रस को रसराज या रसपति कहते है। बाद में श्रृंगार रस के अंतर्गत 2 रस भक्ति रस और वात्सल्य रस आ गए जिससे इनकी संख्या 11 हो गई, किन्तु मूल रस 9 ही माने जाते है।

  • 10 वां रस वात्सल्य रस को आचार्य विश्वनाथ ने माना है
  • 11 वां रस भक्ति रस को रूप गोस्वामी ने माना है

सर्वमतों के अनुसार 11 रस इस प्रकार है- 

क्रम रस स्थायी भाव सरल अर्थ
1 श्रृंगार रस रति प्रेम, अनुराग, आकर्षण
2 हास्य रस हास हँसी, विनोद, प्रसन्नता
3 करुण रस शोक दुःख, वियोग, पीड़ा
4 रौद्र रस क्रोध गुस्सा, आक्रोश
5 वीर रस उत्साह साहस, पराक्रम, जोश
6 भयानक रस भय डर, आतंक
7 बीभत्स रस जुगुप्सा घृणा, अरुचि
8 अद्भुत रस विस्मय आश्चर्य, कौतूहल
9 शांत रस निर्वेद वैराग्य, विरक्ति, संसार से उदासीनता
10 वात्सल्य रस वत्सलता संतान के प्रति प्रेम और ममता
11 भक्ति रस भगवद्-विषयक रति / ईश्वर-रति ईश्वर के प्रति प्रेम, श्रद्धा और समर्पण

रस FAQs-

प्रश्न- रस किसे कहते है?

उत्तर- काव्य को पढ़ने, सुनने या देखने से पाठक या श्रोता को जो अलौकिक आनंद की अनुभूति होती है, उसे रस कहते हिया

प्रश्न- रस का शाब्दिक अर्थ क्या है?

उत्तर- आनंद की अनुभूति

प्रश्न- रस के कितने अंग होते है?

उत्तर- मुख्य रूप से रस के 4 अंग होते है – विभाव, अनुभाव, संचारी भाव और स्थायी भाव 

प्रश्न- विभाव के कितने भेद होते है?

उत्तर- विभाव के 2 भेद होते है – आलंबन और उद्दीपन 

प्रश्न- भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार रसों की संख्या कितनी है?

उत्तर- आठ ( 8 )

प्रश्न- मूल रूप से रसों की संख्या कितनी है?

उत्तर- नौ (9)

प्रश्न- 10 वां रस वात्सल्य रस को किसने माना है?

उत्तर- आचार्य विश्वनाथ

प्रश्न- 11 वां रस भक्ति रस को किसने माना है?

उत्तर- आचार्य रूप गोस्वामी ने

 

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