वीभत्स रस किसे कहते है? परिभाषा, भेद और उदाहरण – हिन्दी व्याकरण
वीभत्स रस किसे कहते है
परिभाषा- घृणित वस्तुओं, घृणित चीज या घृणित व्यक्ति को देखकर या उनके सम्बन्ध में विचार करके या उनके सम्बन्ध में सुनकर मन में उत्पन्न होने वाली घृणा को ही वीभत्स रस कहते है।
सरल शब्दों में – जहाँ किसी गंदी, घृणित या बहुत अप्रिय चीज को देखकर मन में घृणा पैदा हो, वहाँ वीभत्स रस होता है।
- वीभत्स रस का स्थायी भाव जुगुप्सा (घृणा) होता है – अर्थात् जब किसी दृश्य या वस्तु को देखकर मन उसे पसंद न करे और उसके प्रति घृणा या वितृष्णा महसूस करे, तो यही भाव वीभत्स रस का आधार बनता है।
उदाहरण-
चारों ओर शव पड़े थे, रक्त की धारा बहती थी।
दुर्गंध से व्याकुल होकर, जनता दूर भागती थी।
इस वाक्य में शव, रक्त और दुर्गंध जैसे घृणित दृश्यों के कारण मन में जुगुप्सा (घृणा) उत्पन्न हो रही है अतः यह वीभत्स रस का उदाहरण है
वीभत्स रस की प्रमुख विशेषताएँ-
- इसका स्थायी भाव जुगुप्सा (घृणा) है।
- इसमें गंदगी, दुर्गंध, सड़न और घृणित दृश्यों का वर्णन होता है।
- इसमें किसी गंदी, घृणित या अप्रिय वस्तु को देखकर घृणा और अरुचि का भाव उत्पन्न होता है।
- इसे पढ़ने या देखने पर मन में घृणा और अरुचि उत्पन्न होती है।
- इसमें नाक सिकोड़ना, मुँह फेरना और दूर हटना जैसे अनुभाव दिखाई देते हैं।
- युद्ध के बाद के शव, रक्त और घाव आदि के वर्णन में भी इसका प्रयोग हो सकता है।
- घृणा के कारण नाक सिकोड़ना, मुँह फेरना, थूकना, पीछे हटना या उल्टी जैसा महसूस होना आदि भाव दिखाई देते हैं।
वीभत्स रस के भेद-
आचार्य भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार वीभत्स रस के तीन प्रमुख भेद होते हैं
-
क्षोभज (रुधिरादिज) वीभत्स
-
शुद्ध वीभत्स
-
उद्वेगी वीभत्स
इन सभी को विस्तार से समझते है
1. क्षोभज (रुधिरादिज) वीभत्स-
जहाँ रक्त, मांस, घाव, शव आदि को देखकर मन में घृणा और अरुचि का भाव पैदा हो, वहाँ क्षोभज (रुधिरादिज) वीभत्स माना जाता है।
याद रखने की ट्रिक = रक्त + मांस + घाव + शव → घृणा/क्षोभ = क्षोभज वीभत्स रस
उदाहरण –
कटे अंग रणभूमि में, बहता चारों ओर रक्त।
छिन्न-भिन्न शव देखकर, मन में उठे विरक्त भाव॥
इस उदाहरण में रणभूमि में कटे हुए अंग, बहता रक्त और छिन्न-भिन्न शव जैसे घृणित दृश्य हैं। इन्हें देखकर मन में घृणा और क्षोभ उत्पन्न होता है। इसलिए यहाँ क्षोभज (रुधिरादिज) वीभत्स रस है।
2. शुद्ध वीभत्स-
जहाँ किसी गंदी, घृणित या अरुचिकर वस्तु को देखकर मन में घृणा का भाव उत्पन्न हो, वहाँ शुद्ध वीभत्स रस होता है।
उदाहरण –
सड़ी हुई वस्तु पड़ी, चारों ओर दुर्गंध।
उसे देखकर मन हुआ, दूर हटे तुरंत॥
इस उदाहरण में सड़ी हुई वस्तु और उसकी दुर्गंध देखकर मन में घृणा और अरुचि उत्पन्न हो रही है। इसलिए यहाँ शुद्ध वीभत्स रस है।
3. उद्वेगी वीभत्स-
जहाँ किसी घृणित या अप्रिय दृश्य को देखकर मन में घृणा के साथ बेचैनी और मानसिक उद्वेग उत्पन्न हो, वहाँ उद्वेगी वीभत्स रस होता है।
उदाहरण –
सड़कों पर बिखरे शव, चारों ओर दुर्गंध।
दृश्य देखकर मन हुआ, व्याकुल और अशांत॥
इस उदाहरण में शव और दुर्गंध जैसे घृणित दृश्य देखकर व्यक्ति को केवल घृणा ही नहीं होती, बल्कि उसका मन व्याकुल और अशांत भी हो जाता है। इसलिए यहाँ उद्वेगी वीभत्स रस है।
वीभत्स रस के प्रमुख उदाहरण –
- सड़ता शव पड़ा राह में, उठती तीखी गंध।
नाक सिकोड़कर लोग सब, भागे छोड़ सुगंध॥
- कूड़े के ढेरों में सड़ते, भोजन के अवशेष।
दुर्गंध ऐसी उठ रही, मन हो जाए क्लेश॥
- कीचड़ में लथपथ वस्त्र थे, तन पर मक्खी भिनभिनाए।
दुर्गंधित उस दृश्य को, देखकर मन घबराए॥
- सड़े हुए फल-फूल से, भर गया पूरा स्थान।
दुर्गंध से व्याकुल हुए, वहाँ खड़े इंसान॥
- घावों से बहता रक्त था, पस से भरा शरीर।
ऐसा घृणित दृश्य देख, काँप उठा मन धीर॥
- नाली में बहता मैल था, चारों ओर गंदगी।
देखकर वह दृश्य मन में, उपजी घोर विरक्ति॥
- मक्खियों से घिरा हुआ, पड़ा हुआ था अन्न।
दुर्गंधित उस भोजन को, देखकर घृणा हुई मन॥
- रणभूमि में बिखरे पड़े, टूटे अस्त्र-शरीर।
रक्तरंजित धरती देखकर, काँप उठे रणवीर॥
- सड़ी हुई पत्तियों तले, कीड़े रेंग रहे अनेक।
दृश्य देखकर मुँह फेर लिया, मन हुआ अत्यंत क्लेश॥
- दुर्गंधित जल से भर गया, तालाब का विस्तार।
उसे देखकर दूर हुए, पशु-पक्षी सब बारंबार॥
- सड़ी वस्तु से उठ रही, चारों ओर दुर्गंध।
उसे देखकर मन में, उत्पन्न हुई घृणा प्रचंड॥
वीभत्स रस FAQs-
प्रश्न- वीभत्स रस किसे कहते है?
उत्तर-जिस काव्य या रचना को पढ़ने या सुनने से मन में घृणा, अरुचि या नापसंदगी का भाव पैदा हो, वहाँ वीभत्स रस होता है।
प्रश्न- वीभत्स रस का स्थायी भाव क्या होता है?
उत्तर-वीभत्स रस का स्थायी भाव घृणा होता है
प्रश्न- आचार्य भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार वीभत्स रस के कितने भेद होते है?
उत्तर-आचार्य भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार वीभत्स रस के तीन भेद होते है( क्षोभज (रुधिरादिज) वीभत्स, शुद्ध वीभत्स, उद्वेगी वीभत्स )
